Friday, 4 February 2022

बसंत पंचमी

 


बसंत पंचमी यानी मां सरस्वती की पूजा का यह पर्व इस बार 5 फरवरी दिन शनिवार को देशभर में मनाया जाएगा। इस दिन दो शुभ योग बन रहे हैं। 5 फरवरी को मकर राशि में सूर्य और बुध के रहने से बुधादित्य योग बन रहा है। वहीं सभी ग्रह 4 राशियों में विद्यमान रहेंगे। इस कारण केदार योग का भी निर्माण हो रहा है।इस वर्ष बसंत पंचमी के दिन प्रातः चतुर्थी तिथि प्रातः 6.44 बजे तक के बाद पंचमी तिथि सम्पूर्ण भोग करेगी। शनिवार का दिन है, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र व सिद्ध नामक योग मिल रहा है।

अतः इस दिन बसंत पंचमी सर्वमंगलकारी है। पूजन करने का सर्वोत्तम मुहूर्त समय दोपहर 11.46 बजे से 1.44 बजे तक है।

बसंत पंचमी पर ज्ञान और बुद्धि-विवेक की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मां सरस्वती का प्राकट्य और पूरे ब्रह्मांड को ध्वनि का उपहार मिला था। इसलिए इस दिन को बसंत पंचमी के उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

बसंत पंचमी पर मां सरस्वती को मालपुआ और खीर में केसर मिलाकर भोग लगाएं। इस दिन मां सरस्वती की पूजा से जुड़े कुछ खास उपाय करने से हमें बुद्धि और समृद्धि की प्राप्ति होती है,

1) यदि आपकी कुंडली में आपका बृहस्पति ग्रह कमजोर है तो जिस शिक्षक ने आपको पढ़ाया हो, बसंत पंचमी के दिन उनको कोई उपहार भेंट करें और उनसे आशीर्वाद भी ले।

2) यदि आपकी कुंडली में आपका बुध ग्रह कमजोर है तो छोटे बच्चों को और अन्य जरूरतमंदों को कलम, पेंसिल,कॉपी किताब गिफ्ट करें।

3) यदि आपकी कुंडली में आपका चंद्र ग्रह कमजोर है और आपका मन एक जगह टिकता नही तो माता सरस्वती के समक्ष बसंत पंचमी के दिन दूध चीनी चावल अथवा खीर अर्पित करे.

4) यदि आपकी कुंडली में शुक्र पीड़ित है और पति-पत्नी के बीच अक्सर झगड़ा रहता है तो ऐसे दंपती को बसंत पंचमी के दिन राधा कृष्णा की पूजा करनी चाहिए.

5) यदि आप अपनी कोई मनोकामना पूर्ण करना चाहते है तो माँ सरस्वती को सफेद पुष्प, केसर वाला खीर, सफेद कपड़ा, शहद अर्पित करे और अपनी मनोकामना उनके सामने प्रकट करे. उसके पश्चात् पीला कपड़ा निर्धन कन्याओं को दान करे

Sunday, 12 December 2021

अब स्वयं पता लगाए की विवाह कब होगा

 

वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब कुंडली में सप्तमेश की दशा या अन्तर्दशा, सातवें घर में स्थित ग्रहों की दशा या अन्तर्दशा अथवा सातवें घर को देखने वाले ग्रहों दशा अन्तर्दशा हो, यदि छठे घर से संबंधित दशा या अन्तर्दशा चल रही हो तो विवाह में विलंब या विघ्न उत्पन्न होता है। वहीं कई बार विलंब से शादी होने पर भी उपयुक्त जीवन साथी नहीं मिल पाता है। आइये जानते हैं कि किस आयु में विवाह का योग बनता है.


🔰20 से 25 वर्ष की उम्र में शादी🔰


- बुध शीघ ही शादी करवाता है। सातवें घर में बुध हो तो शादी जल्दी होने के योग होते हैं। बीस वर्ष की उम्र में शादी होती है यदि बुध पर कोई किसी अन्य ग्रह का प्रभाव न हो।

- बुध यदि सातवें घर में हो तो सूर्य भी एक स्थान पीछे या आगे होगा या फिर बुध के साथ सूर्य के होने की संभावना रहती है।

- सूर्य साथ हो तो दो साल का विलम्ब शादी में अवश्य होगा। इस तरह उम्र 22 में शादी का योग बनता है।

- यदि सूर्य के अंश क्षीण हों तो शादी केवल 20 से 21 वर्ष की उम्र में हो जाती है। अभिप्राय यह है कि जब बुध सातवें घर में हो तब 20 से 25 की उम्र में शादी का योग बनता है।


🔰25 से 27 की उम्र में शादी🔰


- यदि शुक्र, गुरु या चंद्र आपकी कुंडली के सातवें घर में हैं तो 24-25 की उम्र में शादी होने की प्रबल संभावना रहती है।

- गुरु सातवें घर में हो तो शादी पच्चीस की उम्र में होती है। गुरु पर सूर्य या मंगल का प्रभाव हो तो शादी में एक साल की देर समझें। राहु या शनि का प्रभाव हो तो दो साल की देर यानी 27 साल की उम्र में शादी होती है।

- शुक्र सातवें हो और शुक्र पर मंगल, सूर्य का प्रभाव हो तो शादी में दो साल की देर अवश्यम्भावी है।

- शनि का प्रभाव होने पर एक साल यानी छब्बीस साल की उम्र में और यदि राहु का प्रभाव शुक्र पर हो तो शादी में दो साल का विलंब होता है।

- चंद्र सातवें घर में हो और चंद्र पर मंगल, सूर्य में से किसी एक का प्रभाव हो तो शादी 26 साल की उम्र में होने का योग होगा।

- शनि का प्रभाव मंगल पर हो तो शादी में तीन साल का विलंब होता है। राहु का प्रभाव होने पर 27 वर्ष की उम्र में काफी विघ्नों के बाद शादी संपन्न होती है।

- कुंडली के सातवें घर में यदि सूर्य हो और उस पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव न हो तो 27 वर्ष की उम्र में शादी का योग बनता है। शुभ ग्रह सूर्य के साथ हों तो विवाह में इतनी देर नहीं होती।


🔰28 से 32 वर्ष की उम्र में शादी🔰


- मंगल, राहु केतु में से कोई एक यदि सातवें घर में हो तो शादी में काफी देर हो सकती है। जितने अशुभ ग्रह सातवें घर में होंगे शादी में देर उतनी ही अधिक होगी।

- मंगल सातवें घर में 27 वर्ष की उम्र से पहले शादी नहीं होने देता। राहु यहां होने पर आसानी से विवाह नहीं हो सकता। बात पक्की होने के बावजूद रिश्ते टूट जाते हैं।

- केतु सातवें घर में होने पर गुप्त शत्रुओं की वजह से शादी में अडचनें पैदा करता है।

- शनि सातवें हो तो जीवन साथी समझदार और विश्वासपात्र होता है। अधिकतर मामलों में शादी तीस वर्ष की उम्र के बाद ही होती है।


🔰32 से 40 वर्ष की उम्र में शादी🔰


- शादी में इतनी देर तब होती है जब एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव सातवें घर पर हो। शनि, मंगल, शनि राहु, मंगल राहु या शनि सूर्य या सूर्य मंगल, सूर्य राहु एक साथ सातवें या आठवें घर में हों तो विवाह में बहुत अधिक देरी होने की संभावना रहती है।

- हालांकि ग्रहों की राशि और बलाबल पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है परंतु कुछ भी हो इन ग्रहों का सातवें घर में होने से शादी जल्दी होने की कोई संभावना नहीं होती।

- शादी में देर के लिए जो ऊपर नियम दिए गए हैं उनमे अधिक सूक्ष्म गणना की आवश्यकता जरूर है परंतु मोटे तौर पर ये नियम अत्यंत व्यावहारिक सिद्ध होते हैं।


☘️जल्द विवाह के उपाय☘️


– भगवान शिव के साथ माता पार्वती की भी पूजा करें। माता पार्वती की पूजा खासतौर पर लड़कियों को करनी चाहिए। पूजा में मां पार्वती को सुहाग का सामान चढ़ाएं, बाधाएं दूर होंगी।


– प्रतिदिन विघ्नहर्ता गणेश और रिद्धि-सिद्धि की पूजा करें।


– भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा खास तौर पर गुरुवार को एक साथ करें।


– विवाह में बाधाएं उत्पन्न करने वाले ग्रह गुरु, शनि और मंगल के उपाय करें।


📣किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें। उपरोक्त प्रस्तुत ग्रहो से संबंधित कुछ सूत्र मात्र है. किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पूर्व भाव, भावेश, दशा अंतरदशा, मैत्री, दृष्टि संबंध, नवमांश कुंडली, गोचर आदि का भी विचार अति आवश्यक है. कुंडली विश्लेषण हेतु संपर्क करे.

Wednesday, 24 November 2021

अष्टम भाव में स्थित केतु का फल

 


यहां स्थित केतू के कुछ शुभ फल कहे गए हैं। अत: आप पराक्रमी और सदैव उद्यम करने वाले व्यक्ति हो सकतें हैं। आप अपने कामों के प्रति गंभीर रहते हैं। खेलकूद में भी आपकी गहरी रुचि होगी। आप सुखी रहेंगे। आप शीलवान व्यक्ति हैं। आपको खूब धनलाभ होगा। कई मामलों में आपको सरकार से भी धन की प्राप्ति हो सकती है।

केतु अष्टम भाव में उच्च या शुभ राशिगत होने पर जातक दीर्धायु जीवन पाने वाला होता है। केतु मेष, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक एवं धनु राशि में हो तो अचानक धनलाभ कराने वाला होता है। कोई कोई जातक विरासत या अन्य सूत्र से संपत्ति की प्राप्ति कराने वाला होता है। अशुभ होने पर लोगों के घृणा का पात्र, बुरे लोगों की संगति करने वाला, चालाकी से दूसरों का धन हरपने वाला होता है।
जातक वाहन आदि से गिरकर कष्ट पाने वाला, अर्श या बबासीर आदि का रोगी एवं अल्पायु जीवन पाने वाला होता है। अशुभ केतु अष्टमस्थ होने पर धन का नाश कराने वाला होता है।ब लवान होने पर आयु लंबी होती है एवं ज्योतिष-तंत्र या काला जादू इत्यादि का जानकार होता है तथा ईश्वर या अध्यात्म में तल्लीन होता है।
अधिकांश मामलों में यहां स्थित केतू को अशुभफल देने वाला माना गया है। अत: आपको दुष्टजनों की संगति अधिक प्रिय होगी। आप लोभी और चालाक हो सकते हैं। किसी व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने में आपको कोई हिचक नहीं होगी। आप जाने अंजाने कुछ ऐसे काम कर सकते हैं जो पाप संज्ञक हो सकते हैं। कभी-कभी आपके द्वारा किए कार्यों से विवेकहीनता परिलक्षित हो सकती है।
यहां स्थित केतू आपको गुह्यरोग, मुखरोग या दंत रोग देता है। यह स्थिति आर्थिक मामलों के लिए अच्छी नहीं होती। दूसरों को दिए हुए अपने द्रव्य को मिलने में रुकावट होती है। धन आगमन में व्यवधान आता है। दूसरों के धन और जन के प्रति आशक्ति हो सकती है। वाहन आदि के माध्यम से कष्ट मिल सकता है। मित्रों से विवाद या अलगाव भी हो सकता है।
केतु के विशेष उपाय -
लहसुनिया या लपीज़ लजूली पहने या पांच धातु या सप्त धातु का छल्ला पहनें। गणेश जी की पूजा या गणेश चतुर्थी का व्रत करें। पुत्र, भतीजे, भाजें, दोस्ते, पोते और जवाई की सेवा करें। कानो में सोना पहने। तिल (काले-सफेद) दान करें या जल प्रवाह करें। काले सफेद कम्बल धर्म स्थान में या किसी गरीब को दान दें। नीबू, केला इमली (खट्टी चीजें) दान देना या जल प्रवाह करे। दहेज में दो पलंग और सोने की बेजोड़ अंगुठी लें। कुत्ता पालें या कुत्ते के सेवा करे।
केतु के विषय में-
केतु अशुभ होने पर क्रूर एवं निर्दयी ग्रह कहा गया है। इनका वार गुरुवार है। ये धनु राशि मे उच्च एवं मिथुन राशि इनका नीच स्थान है। अश्विनी, मघा एवं मुला इनके तीन नक्षत्र है। रवि, चंद्र तथा मंगल इनके मित्र ग्रह है।
कैसे होता केतु खराब?
* पुरखों का मजाक उड़ाना, अच्छे से श्राद्धकर्म नहीं करना।
* गृहकलह या घर-परिवार के लोगों से झूठ बोलना।
* माँ दुर्गा, गणेश जी और हनुमान जी का अपमान करना या उनका मजाक उड़ाना।
* घर का वायव्य कोण खराब है तो केतु भी खराब होगा।
* तंत्र-मंत्र, जादू-टोना में विश्वास करने से भी केतु खराब होकर बुरा फल देता है।
* संतानों से अच्छा व्यवहार नहीं रखने पर भी केतु खराब हो जाता है।
केतु खराब की निशानी :
* कुंडली में मंगल के साथ केतु का होना बहुत ही खराब माना गया है।
* चन्द्र के साथ होने से चन्द्रग्रहण माना जाता है।
* मंदा केतु पैर, कान, रीढ़, घुटने, लिंग, किडनी और जोड़ के रोग पैदा कर सकता है।
* मन में हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है।
* नींद में चमककर उठता है व्यक्ति। नींद कुत्ते जैसी हो जाती है।
* व्यक्ति भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने पर विश्वास करने लगता है।
केतु की बीमारी :
* पेशाब की बीमारी।
* संतान उत्पति में रुकावट।
* सिर के बाल झड़ जाते हैं।
* शरीर की नसों में कमजोरी आ जाती है।
* केतु के अशुभ प्रभाव से चर्म रोग होता है।
* कान खराब हो जाता है या सुनने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
* कान, रीढ़, घुटने, लिंग, जोड़ आदि में समस्या उत्पन्न हो जाती है।

अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा का फल



चंद्रमा वृषभ में उच्च, वृश्चिक में नीच का होता है। ज्योतिष् के अनुसार चौथे भाव में चंद्रमा बली और दसवें भाव में मंदा होता है। शनि की राशियों में चंद्र बुरा फल देता है।

आठवें भाव के चंद्रमा को बहुत अच्छा नहीं माना गया है। अत: आपको भी कुछ अनचाहे फलों की प्राप्ति हो सकती है। हांलाकि यहां का चंद्रमा कई शुभ फलों का दाता भी होता है। जिसके कारण आपको व्यापार में लाभ मिलेगा। आप स्वाभिमानी होंगे। आपको विवाह के माध्यम से धन की प्राप्ति होगी। लेकिन यह स्थिति आपको बाचाल बना सकती है।
विषय वासना के प्रति आपकी रुचि अधिक हो सकती है। कामों में अडचने आती हैं। आपको किसी बंधन के कारण दु:ख का सामना करना पड सकता है। यदा कदा किसी-किसी के नजरिए से आप ईर्ष्यालु भी कहे जा सकते हैं। माता मे साथ आपके संबंध अपेक्षाकृत कम ठीक रहेंगे या माता को कष्ट रह सकता है। शत्रुओं के द्वारा परेशानी उत्पन्न होने का भय भी बना रहेगा।
अष्टम भाव के चंद्रमा से आप सदा एक अनजान भय से घिरे रहते हैं, जिसका कोई कारण आपको भी समझ नही आता है. आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी हो सकती है और आपका मनोबल भी गिरा रहता है.
आप सदा दुविधा में घिरे रह सकते हैं और मन में अस्थिरता बनी रहती है. आपको कई बार सही और गलत को पहचानना भी मुश्किल हो जाता है.
चंद्रमा के इस भाव में होने से आप भोगी और विलासी हो सकते हैं और आपके बहुत से संबंध दुनिया से छिपे रह सकते हैं. अनैतिक संबंधो से आपको सचेत रहना चाहिए.
आठवाँ भाव गूढ़ विद्याओ का भी है इसलिए आपकी इनमें रुचि हो सकते हैं और आप गुप्त अथवा डिटेक्टिव एजेंसी से जुड़े काम भी कर सकते हैं. आप जमीन के नीचे से संबंधित वस्तुओ को अपनी आजीविका के साधन बना सकते हैं.
आपको आखों की तकलीफें व अन्य शारीरिक कष्ट हो सकते हैं। आपको सूजन या फेफडे से सम्बंधित किसी तकलीफ का सामना भी करना पड सकता है। जल से संबंधित रोगों का भय आपको आजीवन बना रहेगा। इसके अलावा मनोविकार, चिन्ता नजला जुकाम व खांसी से भी आपको परेशानी हो सकती है.
चंद्र की सावधानियां :
1. जुएं, सट्टे से दूर रहना चाहिए।
2. मांस, मदिरा और अनैतिकता से बचें।
3. माता की सेहत का ध्यान रखें।
4. झूठ न बोलें।
5. किसी भी प्रकार के धोखें से बचें।
क्या करें :
1. घर में चांदी की चीजें रखें।
2. एकादशी का व्रत रखें।
3. अच्छे से श्रद्धा करें और बुजुर्गों और बच्चों के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
4. नाक छिदवाकर उसमें 43 दिनों के लिए चांदी का तार डालें।
5. मंदिर में चना व दाल अर्पण करें। सूर्य, गुरु और मंगल की वस्तुएं दान करें।


 

मृत्यु के विषय में ज्ञान होना तो अत्यंत दुर्लभ है, किंतु फिर भी बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य और अमित ये सात प्रकार की मृत्यु संसार में जानी जाती है।

🔱बालारिष्ट🔱
जन्म से आठ वर्ष तक की आयु तक होने वाली मृत्यु को बालारिष्ट कहा गया है। यह होती क्यों है यह भी जान लीजिए। जन्म कुंडली में लग्न से 6, 8, 12वें स्थान में पापग्रहों से युक्त चंद्रमा हो तो व्यक्ति की मृत्यु बाल्यावस्था में हो जाती है। इसके अलावा सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण का समय हो, सूर्य, चंद्र, राहु एक ही राशि हों तथा लग्न पर क्रूर ग्रहों शनि-मंगल की छाया हो तो बालक के साथ माता की मृत्यु का दुर्योग भी बनता है। लग्न से छठे भाव में च्रंद्रमा, लग्न में शनि और सप्तम में मंगल हो तो बालक के पिता की मृत्यु होती है या उन्हें मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।
बचने के उपाय: ग्रंथों में बालारिष्ट योग से बचने के लिए बालक के गले में चांदी का चंद्रमा और मोती डालकर पहनाया जाता है। इससे बालक के सिर से मृत्यु का संकट टल जाता है, ऐसा विद्वानों का मत है।
🔱योगारिष्ट🔱
आठ वर्ष के पश्चात किंतु 20 वर्ष से पहले होने वाली मृत्यु को योगारिष्ट कहा जाता है। इस प्रकार की मृत्यु तब होती है, जब अष्टम भाव शनि, मंगल जैसे क्रूर ग्रहों से दूषित हो और लग्न में बैठा विपरीत ग्रह वक्री हो। कई विशिष्ट योगों के कारण जातक की मृत्यु होती है इसलिए इसे योगारिष्ट कहते हैं। अमावस्या से पहले की चतुर्दशी, अमावस्या और अष्टमी को यह योग पूर्ण प्रभाव में रहता है। जिन बालकों के माता-पिता कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, उनके बालकों की मृत्यु भी योगारिष्ट होती है।
बचने के उपाय: योगारिष्ट से बचने के लिए शास्त्रों के अनुसार माता-पिता को सद्कर्म करना चाहिए। यदि वे किसी का धन, स्वर्ण चुराते हैं या किसी हत्या में लिप्त रहते हैं तो उनके बालकों की मृत्यु 20 की आयु से पूर्ण होती है। शिव की उपासना इससे बचने का एकमात्र उपाय है।
🔱अल्पायु योग🔱
20 से 32 वर्ष की आयु को अल्पायु कहा गया है। विद्वानों का मत है कि वृषभ, तुला, मकर व कुंभ लग्न वाले जातक अल्पायु होते हैं, लेकिन इन लग्न वाले जातकों की कुंडली में यदि अन्य कोई शुभ ग्रह हो और सूर्य मजबूत स्थिति में हो तो इस योग का प्रभाव नहीं रहता। यदि लग्नेश चर-मेष, कर्क, तुला, मकर राशि में हो तथा अष्टमेश द्विस्वभाव- मिथुन, कन्या, धनु, मीन राशि में हो तो अल्पायु योग होता है। यदि जन्म लग्नेश सूर्य का शत्रु हो तो जातक अल्पायु होता है। इसी प्रकार यदि शनि और चंद्रमा दोनों स्थिर राशि में हों अथवा एक चर और दूसरा द्विस्वभाव में हो तो व्यक्ति की मृत्यु 20 से 32 की आयु के मध्य होती है।
बचने के उपाय: अल्पायु योग टालने के लिए ज्योतिष शास्त्र में कई उपाय बताए गए हैं। सर्वप्रथम जीवन प्रदाता शिव की आराधना, हर दिन महामृत्युंजय मंत्र की 21 माला का जाप करना चाहिए। प्रत्येक माह की दोनों अष्टमियों को शिव का दही से अभिषेक किया जाता है। अनिष्ट ग्रहों का प्रभाव टालने के लिए नवग्रह युक्त पेंडेंट गले में धारण करना चाहिए।
🔱मध्यायु योग🔱
32 वर्ष के बाद से लेकर 64 वर्ष तक की आयु सीमा को मध्यायु कहा गया है। यदि लग्नेश सूर्य का सम ग्रह बुध हो अर्थात मिथुन व कन्या लग्न वालों की प्रायः मध्यम आयु होती है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश में से एक चर- मेष, कर्क, तुला, मकर तथा दूसरा स्थिर- वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है। यदि शनि और चंद्र दोनों की द्विस्वभाव राशि में हों या एक चर तथा दूसरा स्थिर राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश सामान्य स्थानों में हो तो जातक मध्यायु होता है। कई विद्वानों का यह मत भी है कि मध्यायु योग वाले जातकों की मृत्यु जन्म स्थान से बहुत दूर होती है।
बचने के उपाय: इस योग वाले व्यक्ति को अचानक कोई आघात हो सकता है, इसलिए उनसे बचने के लिए चंद्रमा और शनि के उपाय किए जाते हैं। जातक को चांदी का स्वस्तिक गले में धारण करना चाहिए। प्रत्येक शनिवार को तीन गरीबों को काले कंबल और चप्पल दान देने की सलाह दी जाती है
🔱दीर्घायु योग🔱
64 से अधिक एवं 120 वर्ष की आयु तक होने वाली मृत्यु को दीर्घायु या पूर्णायु कहा गया है। यदि जन्म लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो व्यक्ति को पूर्ण आयु प्राप्त होती है। लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर राशि में हो जातक दीर्घायु होता है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश में से एक स्थिर तथा दूसरा द्विस्वभाव हो तो जातक दीर्घायु होता है। यदि शुभ ग्रह तथा लग्नेश केंद्र में हो तो जातक दीर्घायु होता है। लग्नेश केंद्र में गुरु, शुक्र के साथ हो या इनकी दृष्टि हो तो जातक पूर्ण आयु का भोग करता है। लग्नेश पूर्ण बली हो तथा कोई भी तीन ग्रह उच्च, स्वग्रही या मित्र राशिस्थ होकर आठवें भाव में हो तो जातक की पूर्ण आयु होती है। इस योग वाले जातकों का जीवन आमतौर पर सुखमय देखा गया है, लेकिन बीच-बीच में कई प्रकार के रोग परेशान करते हैं। इन जातकों को जीवन पर्यन्त शिव और विष्णु की आराधना करना चाहिए।
🔱दिव्यायु योग🔱
उपरोक्त पांच प्रकार के आयु योग के बाद अब बारी आती है दिव्यायु योग की। वस्तुतः यह योग आयु से जुड़ा नहीं है, किंतु यह बताता है कि व्यक्ति का जीवन कैसा होगा। वह अपने जीवनकाल को किस प्रकार व्यतीत करेगा। यदि शुभ ग्रह बुध, बृहस्पति, शुक्र, चंद्र केंद्र और त्रिकोण में हो और सब पाप ग्रह 3, 6, 11,वें स्थान में हों तथा अष्टम भाव में शुभग्रह या शुभ राशि हो तो व्यक्ति के जीवन में दिव्य आयु का योग बनता है। ऐसा जातक यज्ञ, जप, अनुष्ठान व कायाकल्प क्रियाओं द्वारा हजारों वर्षों तक जीवित रह सकता है। किंतु ग्रंथों में यह स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे जातक का जन्म मृत्यु लोक में संभव नहीं है। ऐसी आयु तपोनिष्ठ ऋषि फिर भी पा सकते हैं।
🔱अमित आयु🔱
अमित आयु पाने वाले प्राणी भी दुर्लभ हैं। देवताओं, वसुओं, गंधर्वों को ऐसी आयु प्राप्त होती है। इसके अनुसार यदि गुरु गोपुरांश यानी अपने चतुर्वर्ग में होकर केंद्र में हो, शुक्र पारावतांश अपने षड्वर्ग में हो एवं कर्क लग्न हो तो ऐसा जातक मानव न होकर देवता होता है। इसकी आयु की कोई सीमा नहीं होती और यह इच्छा मृत्यु का कवच पाने में सक्षम होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यह योग भीष्म को प्राप्त था।

अष्टम भाव में स्थित गुरु का फल

 



बृहस्पति सभी देवताओं के गुरु है। इन्हें सौम्य और शुभ ग्रह माना गया है। इनका वार गुरुवार है। ये कर्क राशि में उच्च और मकर राशि इनका नीच स्थान है। पुर्नवसु, विशाखा और पूर्वभाद्रपद इनके तीन नक्षत्र है। चंद्र, सूर्य तथा मंगल इनके मित्र ग्रह है।

शास्त्र मतानुसार अष्टमस्थ शुभ बृहस्पति से अकाल मृत्यु की संभावना नहीं होती तथा मृत्यु किसी तीर्थ आदि स्थान में सुखपूर्वक होती है। इसके विपरीत गुरु अशुभ राशिगत होने पर मृत्यु के समय घोर कष्टों का सामना करना पड़ता है। गुरु मध्य बलि होने पर मिश्रित फलों का लाभ होता है तथा मृत्यु के समय विशेष कष्ट नही होता। जातक साधारणतः मिलनसार होता है परंतु विनय गुण नही होता। ऐसे जातक दुष्कर्म या मूर्खतापूर्ण कर्म करके भी स्वयं को महान घोषित करते हुए अपना जीवन निर्वाह करते है। शास्त्रों के अनुसार विनयशून्य होने से साधु पुरुष तथा बड़ों का अनादर करते है तथा मलिन चित्त वाला होकर अल्पायु को प्राप्त करता है। पिता के साथ न रहने से अपने जीवन काल में उनकी सेवा से वंचित रह जाते है। स्वस्थ ठीक न होने से जातक स्वयं निरोगी नही हो पाते। जीवन में जो लोग इनकी सहायता करते है उनके प्रति कृतज्ञता या आभार व्यक्त नही करते तथा उन्हें ही अपमानित करते है। अनैतिक रूप से स्त्रियों से संबंध रखने पर पारवारिक जीवन दुर्दशाग्रस्त होता है। धोखाधड़ी तथा फरेब के चलते जनसमाज मे अविश्वसनीय बनकर प्रतिष्ठित होते है ।
बृहस्पति अशुभ कब होता है ?
यदि किसी बुजुर्ग या माता - पिता, गुरु, ब्राम्हण, कुल पुरोहित से झगड़ा करें ।
अपने माता पिता का अनादर करे व उनकी सेवा में कमी ।
पीपल,आम,कटहल और पीले फूल वाले पेड़ पौधे काटने से ।
दूसरों को आशीर्वाद की जगह बददुआ देने से ।
दूसरे की निंदा करने से और बददुआ लेने से ।
धार्मिक स्थान की मर्यादा भंग करने से ।
ईश्वर की नित्य पूजा अर्चना धर्म समझकर न करने से ।
बुद्धिहीनता तथा पारदर्शिता में कमी होने से ।
दादा जी से झगड़ा या दूरव्यवहार करने से ।
आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु न होने से ।
इसके अलावा और कई दोषों की वजह से बृहस्पति अशुभ फल देते हैं।
बृहस्पति के विशेष उपाय-
पुखराज व सोना पहनें ( वृष और सिंह लग्न को छोड़कर ), नाक का पानी खुश्क करके काम शुरु करें। पीपल के वृक्ष को जल दें। माता-पिता दादा या अन्य बुजर्गो व्यक्तियों की सेवा याप्रणाम करे । हरि पूजन करें । चांदी की कटोरी में केसर या हल्दी घोल कर माथेपर तिलक लगाए ,लावारिस लाश को कफन दें। धर्म में विशवास रखें धर्म स्थान में जाए ।घर में धर्म स्थान न रखें । धार्मिक संस्थाओं से जुड़ा धन अपने कार्योंके लिए खर्च न करें । पीले रंग की चीजो का दान करें। किसी से झूठा वायदा न करें। जूठा भोजन न खाए न ही खिलाए मुफ्त माल से परहेज करे। घर के ईशान कोण को हमेशा पवित्र रखें वहा घर का मंदिर बनाएं। धर्म कर्म करें ,रोजाना चंदन तिलक आदि सहित घर पर पूजा अर्चना करें । पूजा पाठ करें। साधु, गुरु, वैष्णवों से संबंध जोड़ें , एक गुरु बनाएं। श्री हरि या श्री विष्णु की उपासना करें ।
गुरु दोष से बचने के लिए वामन द्वादशी के दिन गुरु गायत्री 108 बार करके नाम और गोत्र सहित मंदिर में रखी नारायण शालिग्राम पर चढादें ।
संसार का मोह न करते हुए एक गुरु से दीक्षा लें और प्रति वर्ष गुरु के जन्म दिन तथा गुरु पूर्णिमा के दिन उन्हें पीले वस्त्र, पीले उपवस्त्र, पीले पुष्प की माला, गरुड़ पुराण सहित दान करें और उनके चरण स्पर्श करें और आशीर्वाद लें । नास्तिकता को छोड़कर, मद्य मांस आदि खाना त्यागकर, सदाचारी बनकर , माथे पर केशर और हल्दी का तिलक लगाकर प्रतिदिन घर में सुबह शाम पूजा अर्चना नियमित करने पर गुरु की कृपा का भागी अवश्य बन जाता हैं ।

कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि पर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने का उपाय

 






वैदिक ज्योतिष् के अनुसार चंद्रमा व्यक्ति के जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करता है. चंद्रमा का संबंध मन से है. अगर ये जन्मकुंडली में खराब अवस्था में आ जाए तो व्यक्ति का जीवन मुश्किलों से भर देता है. चंद्रमा की अशुभता को दूर करना बहुत ही जरूरी हो जाता है. चंद्र ग्रह को कर्क राशि का स्वामित्व प्राप्त है और यह वृषभ राशि में उच्च का होता है। वृषभ राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। और इस शुक्रवार कार्तिक पूर्णिमा के उपाय विशेष फलदायक बन जाते है. कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि पर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने का शुभ संयोग बन रहा है.

हिंदू धर्म में पूर्णिमा का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. प्रत्येक वर्ष 12 पूर्णिमाएं होती हैं. जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 13 हो जाती है. कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है. इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है. . इस बार कार्तिक पूर्णिमा 19 नंवबर, 2021शुक्रवार के दिन पड़ रही है.
🔱कार्तिक पूर्णिमा समय 🔱
• कार्तिक पूर्णिमा शुक्रवार, नवम्बर 19, 2021 को
• पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - नवम्बर 18, 2021 को 12:00 पी एम बजे
🔱स्नान की शुभ मुहूर्त 🔱
• कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान करने का शुभ मुहूर्त 19 नवंबर 2021, शुक्रवार को ब्रम्ह मुहूर्त से दोपहर 02:29 तक है।
🔱कार्तिक पूर्णिमा के दिन यह जरूर करें🔱
🌹 मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन दान का भी विशेष महत्व होता है. इस दिन अन्न और वस्त्र आदि का दान करना से पुण्य की प्राप्ति होती है. इस दिन चावल का दान करने से चंद्रमा मजबूत होता है.
🌹 कार्तिक पूर्णिमा के दिन किसी देव स्थान पवित्र नदी या सरोवर में जाकर दीपदान अवश्य करें. इस दिन देव दीपावली होताी है और इस दिन दीपदान करने से देवताओं का आशीर्वाद मिलता है.
🌹 कार्तिक पूर्णिमा के दिन तुलसी में दीप प्रजव्वलित करके विधिवत पूजन अवश्य करना चाहिए. साथ ही शालीग्राम का पूजन भी जरूर करें. ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है.
🌹 कहते हैं कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन घर के मुख्य गेट पर आम के पत्तों और फूलों की तोरण लगाएं. रंगोली बनाएं और सत्यनारायण की कथा करें. इससे भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं और आपके घर में धन- धान्य बना रहता है।
🌹कार्तिक पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी को मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं एवं पांच कन्याओं को खिलाएं। इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अपना आर्शीवाद भक्तों को देती हैं। इस दिन अपनी पत्नी, मां, बहन या बेटी को कुछ न कुछ उपहार जरूर दें क्योंकि उनमें साक्षात् लक्ष्मी का वास माना जाता है और ऐसा करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
🌹पूर्णिमा के दिन जो भी जातक मीठे जल में दूध मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाता है उस पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
🌹कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्र का रत्न मोती धारण करें इससे चंद्र मजबूत होगा और इससे जुड़े बुरे प्रभाव दूर होंगे।

जानिए क्या होता है कुंडली में लग्न

 




🌹जानिए क्या होता है कुंडली में लग्न🌹
कुंडली के प्रथम भाव को लग्न कहकर ही संबोधित किया जाता है और लग्न भाव अर्थात कुंडली के प्रथम भाव में स्थित राशि का स्वामी लग्नेश कहलाता है। ज्योतिष में लग्न भाव और लग्नेश की स्थिति को बड़ा ही महत्व पूर्ण माना गया है।
लग्न और लग्नेश मजबूत होने से कुंडली बहुत बली हो जाती है। लग्न और लग्नेश का कमजोर या पीड़ित होना कुंडली को कमजोर बनाकर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष की अधिकता उत्पन्न करता है।
यदि कुंडली में लग्न शुभ ग्रहों से प्रभावित हो तथा लग्नेश केंद्र, त्रिकोण (1,4,7,10,5,9 भाव) आदि शुभ स्थानों में हो या स्व उच्च राशि में होकर बली हो तो ऐसे में व्यक्ति का स्वास्थ्य पक्ष अच्छा होता है, व्यक्ति आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है और लग्नेश के बलवान होने पर व्यक्ति को धन सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और यश की प्राप्ति होती है, लग्नेश बली और शुभ स्थिति में होने पर व्यक्ति के मुख पर तेज उत्पन्न होता है और व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व आकर्षक होते हैं। जिन व्यक्तियों की कुंडली में लग्नेश लग्न में ही स्थित हो या लग्नेश की लग्न पर दृष्टि पड़ती हो ऐसे व्यक्ति बहुत प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा पाने वाला अपने क्षेत्र में जाना माना व्यक्ति होता है।
यदि कुंडली में लग्नेश बली स्थिति में होकर केंद्र में हो और पाप प्रभाव से मुक्त हो तो ऐसा केंद्र में बैठा बली लग्नेश बहुत समृद्धि और उन्नति दायक माना गया है। कुंडली में लग्नेश का मजबूत होना केवल स्वास्थ्य या प्रसिद्धि ही नहीं देता बल्कि जीवन के पूर्ण विकास और उन्नति में बहुत सहायक होता है।
यदि कुंडली के लग्न भाव में पाप योग (गुरु चांडाल योग, ग्रहण योग आदि) बने हुए हों, लग्नेश दुःख भावों में हो, नीच राशि में हो या अन्य प्रकार से जब लग्नेश पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति के जीवन परेशानियों की अधिकता बढ़ जाती है, स्वास्थ्य समस्याएं अधिक होती हैं, व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है तथा लग्न और लग्नेश के कमजोर होने पर व्यक्ति को प्रसिद्धि नहीं मिल पाती और किए गए अच्छे कार्यों का यश नहीं मिल पाता, भला करने पर भी भलाई नहीं मिलती।
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शनि का उपाय

 


अष्टम भाव में स्थित सूर्य का फल

 


सूर्य सभी ग्रहो के स्वामी तथा संपूर्ण ब्रम्हांड के कर्ता है। इन्हे क्रूर ग्रह कहा गया है। इनका वार रविवार हैं। यह मेष राशि में उच्च तथा तुला राशि इनका नीच स्थान है। कृतिका, उत्तरफाल्गुनी तथा उत्तराषाढ़ा इनके तीन नक्षत्र है। बृहस्पति, चंद्र और मंगल इनके मित्र ग्रह है।

अष्टम भाव आयु, दुर्घटनाओं, विपरीत राजयोग, गुप्त रोगादि का माना जाता है। यहाँ से पूर्व जन्म का लेखाजोखा भी देखा जाता है। इस भाव से जलीय यात्रा का भी विचार किया जाता है। इस भाव में स्वक्षेत्री सूर्य बैठे तो उसको स्वछंद बना देता है। ऐसा सूर्य स्त्री के लिए ठीक नहीं होता, बदनामी का कारण भी बन सकता है।सूर्य अष्टम भाव में हो जातक को विवेकहीन, कृशांग, क्रोधी एवं स्वल्प वैभव युक्त बनाता है। जातक के साथ किसी दूर के स्त्री के साथ उसका अटूट संपर्क युवा काल में कई वर्षों तक बना रहता है। वो मादक द्रव्य आदि का सेवन करने वाला तथा आलस्य के कारण ही निर्धन होकर नशे का शिकार बनता है। जातक विद्वानों का सम्मान करने वाला, चंचल, त्यागी, अधिक बकवास करने वाला, कामासक्त, विदेशी अथवा विधर्मी स्त्रियों से सम्बन्ध रखने वाला, अग्राह्य वस्तुओं का सेवन करने वाला, सदैव रोग पीड़ित, शील रहित, कुवस्त्रधारी, नीच सेवी, भाग्यहीन, परदेश में रहकर कष्ट पाने वाला, वन्धु वर्ग से अपमानित एवं धोखा खाने वाला क्रोधी, अल्पधनी, कलहप्रिय, दुर्बल, क्षय-रोगी, नेत्र-रोगी, कम पुत्रों वाला, शस्त्र द्वारा आघात पाने वाला, अज्ञातवास अथवा बन्धन या कारावास पाने वाला तथा विशेष अशुभ होने पर राजदण्ड से मृत्यु पाने वाला होता है। पति-पत्नी दोनों ही बीमार रहेते हैं। यदि अष्टमेश बलीग्रह के साथ हो तो इच्छानुमार ज़मीन या भुमि का लाभ होता है। स्वक्षेत्री अथवा उच्चस्थ हो तो जातक दीर्घायु अवश्य होता है।
सूर्य कब अशुभ होता है ?
सरकारी कार्यों में बाधा या विद्रोह उत्पन्न होना या खुद ही राजद्रोही होना। ब्लैक मार्केटर या स्मगलर होना, टैक्स की चोरी करना, शराबी-कबाबी होना, गरम स्वभाव का होना, झूठ बोलना या वादे का कच्चा होना, रक्त चाप का रोगी, नास्तिक होने से, मुकदमे में हारने से, मुफ्त माल पर नज़र रखना, आँखों के रोगों से परेशान, दक्षिण दिशा का मकान होने से, कुंडली में सूर्य से संबंधित पितृ दोष या कोई और दोष होने से। इन दोषों को कम करने के लिए सूर्य के इन उपायों को सहारा लें। इस ऊपर वर्णित कारणों के अलावा सूर्य के अशुभ होने के और भी कई सारे कारण हो सकते हैं जिसके लिए जन्म कुंडली आवश्यक होती हैं। जिनव्येक्तियों के जन्म कुंडली नही हैं वो भी इन उपायों का सहारा लेकर सूर्य दोष को प्रशमित कर सकतें हैं। निष्ठा और पवित्रता के साथ इन उपायों को रविवार के दिन करें।
सूर्य के अन्य विशेष उपाय -
सूर्य को प्रतिदिन लाल चंदन लगाकर जल अर्पित कर प्रणाम करें।
तांबे या माणिक्य धारण करें। (मकर लग्न वालों) को छोड़कर।
वैशाख मास के दूसरे रविवार से लगातार 43 दिन नित्य स्नानोपरांत रक्त चंदन आदि का तिलक लगाकर पूर्वमुखी बैठकर होकर "आदित्य हृदय" स्त्रोत्र का पाठ करें।
घर का आंगन खुला रखना और पूर्व दिशा में दरवाजा होना।
हरिवंश पुराण तथा रामचरित मानस की कथा करें या खुद पाठ करें।
गेहूं, लाल चंदन, गन्ने का गुड़,ताम्बा, गुलाबी वस्त्र आदि का दान करें। लाल मुह वाले बंदर को रोटी में गन्ने का गुड़ रखकर को खिलाएं।
घर के पूर्वी दिशा में खुला आंगन होने से। रवि पुष्यामृत योग में एक विल्व वृक्ष स्थिर लग्न में घर के वायुकोण के उत्तरी दिशा में रोपण करें और नित्य जल दान आदि से नियमित देख भाल करें।
सदा सत्य का सहारा लें। मिथ्यावादी बनने से बचें।
सूर्य दोष सेे सदैव बचे रहने के लिए ईमानदार होना और सात्विक होना जरूरी होता हैं क्योंकि सूर्य एक सात्विक ग्रह हैं।
श्री राम, देवी मातंगी और सूर्यदेव की पूजा अर्चना हमेशा करते रहें। स्वात्विक आहार करें। मद्य, मांस आदि का त्याग करें।
वेदों में सूर्य का दान-
माणिक्य ( आभाव में एक रुपए ), गोधूम, सवत्स धेनु, कुसुम्भरंजीत वस्त्र, गुड़, स्वर्ण, ताम्र, रक्तचंदन,रक्तपद्म, सवस्त्र भोज्य, दक्षिणा सहित मंत्र द्वारा दान करें। सूर्य का वैदिक मंत्र ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय। जपसंख्या ६०००, देवी मातंगी, अधिदेवता शिव, प्रत्याधि देवता वन्हि, कश्यप गोत्र, क्षत्रिय,कॉलिंग, द्वादशांगूल, द्विभुज, मंडल मध्यवर्ती, वर्तुलाकृति, रक्तवर्ण, ताम्रमूर्ति, सप्ताश्वारुढ़, श्री रामचंद्र अवतार , पुष्पादि जवाकुसुम एवं रक्तवर्ण पुष्प, धुप गुगुल, बलि गुड़ मिश्रित अन्न, समिध श्वेतार्क, दक्षिणा आदि।
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कौन-सा दीप किस हेतु जलाया जाता है

 

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दीपक कई प्रकार के होते हैं, जैसे चांदी के दीपक, मिट्टी के दीपक, लोहे के दीपक, ताम्बे के दीपक, पीतल की धातु से बने हुए दीपक तथा आटे से बनाए हुए दीपक। आओ जानते हैं कि कौन-सा दीप किस हेतु जलाया जाता है

1. आटे का दीपक : किसी भी प्रकार की साधना या सिद्धि हेतु आटे का दीपक बनाते हैं और इसे ही पूजा करने के लिए सबसे उत्तम मानते हैं।
2. घी का दीपक : आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने के लिए रोजाना घर के देवालय में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे देवी-देवता भी प्रसन्न होते हैं। आश्रम तथा देवालय में अखंड ज्योत जलाने के लिए भी शुद्ध गाय के घी का या तिल के तेल का उपयोग किया जाता है।
3. सरसों के तेल का दीपक : शत्रुओं से बचने के लिए भैरवजी के यहां सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए भी सरसों का दीपक जलाते हैं।
4. सरसो के तेल का दीपक : शनि ग्रह की आपदा से मुक्ति हेतु सरसो के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इससे देवी-देवता भी प्रसन्न होते हैं।
5. महूए के तेल का दीपक : पति की लंबी आयु की मनोकामना को पूर्ण करने के लिए घर के मंदिर में महुए के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
6. अलसी के तेल का दीपक : राहु और केतु ग्रहों की दशा को शांत करने के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
7. चमेली के तेल से भरा तिकोना दीपक : संकटहरण हनुमानजी की पूजा करने के लिए तथा उनकी कृपा आप पर सदैव बनी रहे, इसके लिए तीन कोनों वाला दीपक जलाना चाहिए।
8. गहरा और गोल दीपक : ईष्ट सिद्धि के लिए या ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक गहरा और गोल दीपक प्रज्वलित करें।
9. मध्य से ऊपर की ओर उठा हुआ दीपक : शत्रुओं से बचने या किसी भी आपत्ति के निवारण के लिए मध्य से ऊपर की ओर उठे हुए दीपक का प्रयोग जलाने के लिए करना चाहिए।
10. गिलोय का दीपक : पति की दीर्घायु के लिए गिलोय का दीपक जलाना चाहिए।
कितनी बत्तियों का दीपक जलाएं किस भगवान् के आगे और किस इच्छा पूर्ति के लिए जानने के लिए पढ़े--
1) भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए तीन बत्तियों वाला दीपक जलानें और गणपति shotra का पाठ करने से मनोकामनायें पूर्ण होती है।
2) यदि आप मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं और चाहते हैं कि उनकी कृपा आप पर बरसे तो उसके लिए आपको सातमुखी दीपक जलायें। और श्री सूक्त का पाठ करे।
3) यदि आपका सूर्य ग्रह कमजोर है तो उसे बलवान करने के लिए, आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करें और साथ में सरसों के तेल का एक बत्ति वाला दीपक जलायें।
4) आर्थिक लाभ पाने के लिए आपको नियमित रूप से शुद्ध देशी गाय के घी का एक मुखी दीपक जलाना चाहिए।
5) शत्रुओं व विरोधियों के दमन हेतु भैरव जी के समक्ष चार बत्तियों वाला सरसों के तेल का दीपक जलाने से लाभ होगा और साथ मे बटुक भैरव shotra का पाठ करें।
6) शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या से पीड़ित लोग शनि मन्दिर में शनि स्त्रोत का पाठ करें और सरसो के तेल का एक बत्ती वाला
दीपक जलायें।
7) पति की आयु व अरोग्यता के लिए महुये के तेल का पंच बत्तियों वाला दीपक जलाने से अल्पायु योग भी नष्ट हो जाता है।
😎 शिक्षा में सफलता पाने के लिए सरस्वती जी की आराधना करें और दो मुखी घी वाला दीपक जलाने से अनुकूल परिणाम आते हैं।
9) मां दुर्गा या काली जी प्रसन्नता के लिए एक मुखी दीपक गाय के घी में जलाना चाहिए।
10) भोले बाबा की कृपा बरसती रहे इसके लिए आठ या बारह मुखी पीली सरसों के तेल वाला दीपक जलाना चाहिए।
11) भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए सोलह बत्तियों वाला गाय के घी का दीपक जलाना लाभप्रद होता है।
12) हनुमान जी की प्रसन्नता के लिए तिल के तेल आठ बत्तियों वाला दीपक जलाना अत्यन्त लाभकारी रहता है। इसके अलावा आटे का दीपक बना कर चार बत्तियों का दीपक धन वृद्धि के लिए भी जला सकते है। हनुमान चालीसा का पाठ करें।
13) गुरु को बलवान करने के लिए बत्ती को हल्दी में रंग कर 4 मुँह का दीपक केले के पेड़ पर चढ़ाये।
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बसंत पंचमी

  बसंत पंचमी यानी मां सरस् ‍ वती की पूजा का यह पर्व इस बार 5 फरवरी दिन शनिवार को देशभर में मनाया जाएगा। इस दिन दो शुभ योग बन रहे हैं। 5 फरवर...