कुंडली के प्रथम भाव को लग्न कहकर ही संबोधित किया जाता है और लग्न भाव अर्थात कुंडली के प्रथम भाव में स्थित राशि का स्वामी लग्नेश कहलाता है। ज्योतिष में लग्न भाव और लग्नेश की स्थिति को बड़ा ही महत्व पूर्ण माना गया है।
लग्न और लग्नेश मजबूत होने से कुंडली बहुत बली हो जाती है। लग्न और लग्नेश का कमजोर या पीड़ित होना कुंडली को कमजोर बनाकर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष की अधिकता उत्पन्न करता है।
यदि कुंडली में लग्न शुभ ग्रहों से प्रभावित हो तथा लग्नेश केंद्र, त्रिकोण (1,4,7,10,5,9 भाव) आदि शुभ स्थानों में हो या स्व उच्च राशि में होकर बली हो तो ऐसे में व्यक्ति का स्वास्थ्य पक्ष अच्छा होता है, व्यक्ति आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है और लग्नेश के बलवान होने पर व्यक्ति को धन सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और यश की प्राप्ति होती है, लग्नेश बली और शुभ स्थिति में होने पर व्यक्ति के मुख पर तेज उत्पन्न होता है और व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व आकर्षक होते हैं। जिन व्यक्तियों की कुंडली में लग्नेश लग्न में ही स्थित हो या लग्नेश की लग्न पर दृष्टि पड़ती हो ऐसे व्यक्ति बहुत प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा पाने वाला अपने क्षेत्र में जाना माना व्यक्ति होता है।
यदि कुंडली में लग्नेश बली स्थिति में होकर केंद्र में हो और पाप प्रभाव से मुक्त हो तो ऐसा केंद्र में बैठा बली लग्नेश बहुत समृद्धि और उन्नति दायक माना गया है। कुंडली में लग्नेश का मजबूत होना केवल स्वास्थ्य या प्रसिद्धि ही नहीं देता बल्कि जीवन के पूर्ण विकास और उन्नति में बहुत सहायक होता है।
यदि कुंडली के लग्न भाव में पाप योग (गुरु चांडाल योग, ग्रहण योग आदि) बने हुए हों, लग्नेश दुःख भावों में हो, नीच राशि में हो या अन्य प्रकार से जब लग्नेश पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति के जीवन परेशानियों की अधिकता बढ़ जाती है, स्वास्थ्य समस्याएं अधिक होती हैं, व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है तथा लग्न और लग्नेश के कमजोर होने पर व्यक्ति को प्रसिद्धि नहीं मिल पाती और किए गए अच्छे कार्यों का यश नहीं मिल पाता, भला करने पर भी भलाई नहीं मिलती।

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