बृहस्पति सभी देवताओं के गुरु है। इन्हें सौम्य और शुभ ग्रह माना गया है। इनका वार गुरुवार है। ये कर्क राशि में उच्च और मकर राशि इनका नीच स्थान है। पुर्नवसु, विशाखा और पूर्वभाद्रपद इनके तीन नक्षत्र है। चंद्र, सूर्य तथा मंगल इनके मित्र ग्रह है।
शास्त्र मतानुसार अष्टमस्थ शुभ बृहस्पति से अकाल मृत्यु की संभावना नहीं होती तथा मृत्यु किसी तीर्थ आदि स्थान में सुखपूर्वक होती है। इसके विपरीत गुरु अशुभ राशिगत होने पर मृत्यु के समय घोर कष्टों का सामना करना पड़ता है। गुरु मध्य बलि होने पर मिश्रित फलों का लाभ होता है तथा मृत्यु के समय विशेष कष्ट नही होता। जातक साधारणतः मिलनसार होता है परंतु विनय गुण नही होता। ऐसे जातक दुष्कर्म या मूर्खतापूर्ण कर्म करके भी स्वयं को महान घोषित करते हुए अपना जीवन निर्वाह करते है। शास्त्रों के अनुसार विनयशून्य होने से साधु पुरुष तथा बड़ों का अनादर करते है तथा मलिन चित्त वाला होकर अल्पायु को प्राप्त करता है। पिता के साथ न रहने से अपने जीवन काल में उनकी सेवा से वंचित रह जाते है। स्वस्थ ठीक न होने से जातक स्वयं निरोगी नही हो पाते। जीवन में जो लोग इनकी सहायता करते है उनके प्रति कृतज्ञता या आभार व्यक्त नही करते तथा उन्हें ही अपमानित करते है। अनैतिक रूप से स्त्रियों से संबंध रखने पर पारवारिक जीवन दुर्दशाग्रस्त होता है। धोखाधड़ी तथा फरेब के चलते जनसमाज मे अविश्वसनीय बनकर प्रतिष्ठित होते है ।
बृहस्पति अशुभ कब होता है ?
यदि किसी बुजुर्ग या माता - पिता, गुरु, ब्राम्हण, कुल पुरोहित से झगड़ा करें ।
अपने माता पिता का अनादर करे व उनकी सेवा में कमी ।
पीपल,आम,कटहल और पीले फूल वाले पेड़ पौधे काटने से ।
दूसरों को आशीर्वाद की जगह बददुआ देने से ।
दूसरे की निंदा करने से और बददुआ लेने से ।
धार्मिक स्थान की मर्यादा भंग करने से ।
ईश्वर की नित्य पूजा अर्चना धर्म समझकर न करने से ।
बुद्धिहीनता तथा पारदर्शिता में कमी होने से ।
दादा जी से झगड़ा या दूरव्यवहार करने से ।
आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु न होने से ।
इसके अलावा और कई दोषों की वजह से बृहस्पति अशुभ फल देते हैं।
बृहस्पति के विशेष उपाय-
पुखराज व सोना पहनें ( वृष और सिंह लग्न को छोड़कर ), नाक का पानी खुश्क करके काम शुरु करें। पीपल के वृक्ष को जल दें। माता-पिता दादा या अन्य बुजर्गो व्यक्तियों की सेवा याप्रणाम करे । हरि पूजन करें । चांदी की कटोरी में केसर या हल्दी घोल कर माथेपर तिलक लगाए ,लावारिस लाश को कफन दें। धर्म में विशवास रखें धर्म स्थान में जाए ।घर में धर्म स्थान न रखें । धार्मिक संस्थाओं से जुड़ा धन अपने कार्योंके लिए खर्च न करें । पीले रंग की चीजो का दान करें। किसी से झूठा वायदा न करें। जूठा भोजन न खाए न ही खिलाए मुफ्त माल से परहेज करे। घर के ईशान कोण को हमेशा पवित्र रखें वहा घर का मंदिर बनाएं। धर्म कर्म करें ,रोजाना चंदन तिलक आदि सहित घर पर पूजा अर्चना करें । पूजा पाठ करें। साधु, गुरु, वैष्णवों से संबंध जोड़ें , एक गुरु बनाएं। श्री हरि या श्री विष्णु की उपासना करें ।
गुरु दोष से बचने के लिए वामन द्वादशी के दिन गुरु गायत्री 108 बार करके नाम और गोत्र सहित मंदिर में रखी नारायण शालिग्राम पर चढादें ।
संसार का मोह न करते हुए एक गुरु से दीक्षा लें और प्रति वर्ष गुरु के जन्म दिन तथा गुरु पूर्णिमा के दिन उन्हें पीले वस्त्र, पीले उपवस्त्र, पीले पुष्प की माला, गरुड़ पुराण सहित दान करें और उनके चरण स्पर्श करें और आशीर्वाद लें । नास्तिकता को छोड़कर, मद्य मांस आदि खाना त्यागकर, सदाचारी बनकर , माथे पर केशर और हल्दी का तिलक लगाकर प्रतिदिन घर में सुबह शाम पूजा अर्चना नियमित करने पर गुरु की कृपा का भागी अवश्य बन जाता हैं ।
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