Monday, 15 November 2021

अष्टम भाव में चंद्रमा का फल

 



चंद्रमा वृषभ में उच्च, वृश्चिक में नीच का होता है। ज्योतिष् के अनुसार चौथे भाव में चंद्रमा बली और दसवें भाव में मंदा होता है। शनि की राशियों में चंद्र बुरा फल देता है।

आठवें भाव के चंद्रमा को बहुत अच्छा नहीं माना गया है। अत: आपको भी कुछ अनचाहे फलों की प्राप्ति हो सकती है। हांलाकि यहां का चंद्रमा कई शुभ फलों का दाता भी होता है। जिसके कारण आपको व्यापार में लाभ मिलेगा। आप स्वाभिमानी होंगे। आपको विवाह के माध्यम से धन की प्राप्ति होगी। लेकिन यह स्थिति आपको बाचाल बना सकती है।
विषय वासना के प्रति आपकी रुचि अधिक हो सकती है। कामों में अडचने आती हैं। आपको किसी बंधन के कारण दु:ख का सामना करना पड सकता है। यदा कदा किसी-किसी के नजरिए से आप ईर्ष्यालु भी कहे जा सकते हैं। माता मे साथ आपके संबंध अपेक्षाकृत कम ठीक रहेंगे या माता को कष्ट रह सकता है। शत्रुओं के द्वारा परेशानी उत्पन्न होने का भय भी बना रहेगा।
अष्टम भाव के चंद्रमा से आप सदा एक अनजान भय से घिरे रहते हैं, जिसका कोई कारण आपको भी समझ नही आता है. आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी हो सकती है और आपका मनोबल भी गिरा रहता है.
आप सदा दुविधा में घिरे रह सकते हैं और मन में अस्थिरता बनी रहती है. आपको कई बार सही और गलत को पहचानना भी मुश्किल हो जाता है.
चंद्रमा के इस भाव में होने से आप भोगी और विलासी हो सकते हैं और आपके बहुत से संबंध दुनिया से छिपे रह सकते हैं. अनैतिक संबंधो से आपको सचेत रहना चाहिए.
आठवाँ भाव गूढ़ विद्याओ का भी है इसलिए आपकी इनमें रुचि हो सकते हैं और आप गुप्त अथवा डिटेक्टिव एजेंसी से जुड़े काम भी कर सकते हैं. आप जमीन के नीचे से संबंधित वस्तुओ को अपनी आजीविका के साधन बना सकते हैं.
आपको आखों की तकलीफें व अन्य शारीरिक कष्ट हो सकते हैं। आपको सूजन या फेफडे से सम्बंधित किसी तकलीफ का सामना भी करना पड सकता है। जल से संबंधित रोगों का भय आपको आजीवन बना रहेगा। इसके अलावा मनोविकार, चिन्ता नजला जुकाम व खांसी से भी आपको परेशानी हो सकती है.
चंद्र की सावधानियां :
1. जुएं, सट्टे से दूर रहना चाहिए।
2. मांस, मदिरा और अनैतिकता से बचें।
3. माता की सेहत का ध्यान रखें।
4. झूठ न बोलें।
5. किसी भी प्रकार के धोखें से बचें।
क्या करें :
1. घर में चांदी की चीजें रखें।
2. एकादशी का व्रत रखें।
3. अच्छे से श्रद्धा करें और बुजुर्गों और बच्चों के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
4. नाक छिदवाकर उसमें 43 दिनों के लिए चांदी का तार डालें।
5. मंदिर में चना व दाल अर्पण करें। सूर्य, गुरु और मंगल की वस्तुएं दान करें।
May be an image of 1 person and text that says "Dr. ikhil Monga कुंडली के अष्टम भाव (8th house) में चंद्रमा का फल 12 10 Astrologer Dr. Nikhil Monga"

अष्टम भाव में बुध का फल

 


🌳☘️बुध के विषय में- ☘️🌳
🌼🪴बुध मिथुन और कन्या राशि के स्वामी है। ये एक बालक एवं सौम्य ग्रह है। इनका दिन बुधवार है। अश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती इनके तीन नक्षत्र है। रवि एवं शुक्र इनके मित्र ग्रह है। 🪴🌼
🌳बुध अष्टम वाला जातक दूसरे की धन- संपदा को हरण कर लेने वाला या व्यवसाय द्वारा विपुल धनलाभ करने वाला होता है।यहां बुध है तो व्यक्ति गुप्त विद्याओं में रुचि रखने वाला तथा तेज स्मरण शक्ति का होगा। अतिथि सेवक और राज पक्ष का होने के साथ ही आप अपनी विनम्रता के कारण प्रसिद्ध और धनी बनेंगे। आपमें दूसरों के कष्ट को दूर करने की सामर्थ्य होगी, लेकिन आपको साझेदारी का व्यापार करने के लिए सोचना समझना होगा। पार्टनर गलत भी हो सकता है। आपको मस्तिष्क और नसों से संबंधित रोग हो सकते हैं। यदि बुध के साथ उसके शत्रु ग्रह न होंगे तो यहां स्थिति बुध अच्छा फल देगा। दूर स्थित राज्यों या देश-विदेश में उसके यश और कीर्ति में वृद्धि होती है।🌳
🌳यदि बुध अष्टम भाव में उत्तम स्थिति में हो तब जातक रिसर्च वर्क में इंटरेस्टेड होगा। जातक पीएचइडी या अन्य दूसरे रिसर्च कार्यो में अध्ययन करेगा। यदि अष्टम भाव में स्थित बुध पीड़ित हो तब जातक अपनी शिक्षा में परेशानी का सामना करेगा।🌳
🌳यदि बुध अष्टम भाव में केतु या मंगल से पीड़ित हो तब जातक को त्वचा से संबंधित समस्या का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही जातक को एलर्जी या मानसिक अवसाद से भी पीड़ित होना पड़ सकता है। यदि अष्टम भाव में स्थित बुध शुक्र और मंगल या चंद्रमा के प्रभाव में हो तब जातक का सीक्रेट अफेयर हो सकता है।🌳
🌳अष्टम भाव में स्थित बुध जातक के अपने रिश्तेदारों और मित्रों से संबंध खराब कर सकता है जातक बेवजह सोच सोच कर या अपने रिश्तेदारों या मित्रों के प्रति अफवाह से ग्रसित होकर उनसे संबंध खराब कर सकता है।🌳
🌳बुध पाप राशि या पाप ग्रह युक्त होने पर या बलहीन होने पर कामी एवं पतित, रोगी या अल्पायु होता है। बलवान बुध शुभ राशिगत या शुभ ग्रह युत-दृष्ट होने पर आयु में वृद्धि होती है। शुभ बुध से विनयी भाव से वर्तालापी, अतिथि सत्कार प्रिय, वाणिज्य से ज्यादा धन लाभ तथा जन्मस्थान से दूर उसकी ख्याति और लोकप्रियता की वृद्धि होती है। अपनी वाणी द्वारा दूसरों को तुरंत वश में करके अपना कार्य सिद्ध कर लेने वाला होता है। पाप राशिगत दूषित बुध विशेष अशुभ होने पर बात करने में कठिनाई पाने वाला या तुतलाकर बोलने वाला होता है। पार्टनरशिप में व्यापार से हानि होती है। विवाद आदि से मुकद्दमों में धन का नाश करवाने वाला, पत्नी द्वारा आदर न पाने वाला, शरीर में स्नायु दुर्बलता आदि का रोग पनपने लगता है। अशुभ बुध से भाग्यहीन , बुद्धिहीन तथा शुभ बुध से युवती नारी सहित क्रीड़ारत होकर सुखी होता है.🌳
🔱🪴बुध के विशेष उपाय-🪴🔱
पन्ना धारण करें या पारा या कलई धारण करें।
नाक छिदवाए।
लड़की, बहन, बुआ,मौसी की सेवा करें।
दुर्गा पाठ करें या कन्याओं की सेवा करें।
हलवा ,कद्दू ( सीता फल ) मंदिर में दान करें।
हरे रंग की चीजों का हिजड़ों को दान करें।
भेड़, बकरी, तोते की सेवा करें। अंडा न खाएं।
कांसे के कटोरी में सबूत हरी मूंग भरकर मंदिर में दान करें.
श्री गोपाल, श्री गणेश, देवी नील सरस्वती ,नृसिंह, देवी त्रिपुरसुंदरी, बुद्ध और बुध देव की पूजा अर्चना करने पर भी बुध के अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता हैं
🔱🪴बुध अशुभ कब होता है ?🪴🔱
धागे ताबीज़, जल, बिभूतियाँ (राख) अपने पास जेब में रखने से या घर में रखने से।
पत्थरों के पिंड रखने से।
शिक्षक, ज्योतिषी का पैसा मारने पर ।
पीतल के बर्तन कोरे बंद हो।
बहन, लड़की का धन मार लेना या उनसे धन मांगना।
क्रोध करना ,बंद जुबान होना।
पूछने पर जवाब न देना, वायदे का कच्चा होना।
फ़ोन, कैलक्यूलेटर, घड़ी आदि सामान खराब होने पर।
भेड़ बकरी का मांस खाने पर। घर में धर्म स्थान बदलने पर। किताबें चोरी करने पर।
किसी बालक को मारना या सताने पर।
तोते को मारने पर।
घर में हरियाली बिल्कुल न होने पर।

ग्रह शांति के उपाय

 


वैदिक ज्योतिष में सात प्रकार की मृत्यु

  


मृत्यु के विषय में ज्ञान होना तो अत्यंत दुर्लभ है, किंतु फिर भी बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य और अमित ये सात प्रकार की मृत्यु संसार में जानी जाती है।

🔱बालारिष्ट🔱
जन्म से आठ वर्ष तक की आयु तक होने वाली मृत्यु को बालारिष्ट कहा गया है। यह होती क्यों है यह भी जान लीजिए। जन्म कुंडली में लग्न से 6, 8, 12वें स्थान में पापग्रहों से युक्त चंद्रमा हो तो व्यक्ति की मृत्यु बाल्यावस्था में हो जाती है। इसके अलावा सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण का समय हो, सूर्य, चंद्र, राहु एक ही राशि हों तथा लग्न पर क्रूर ग्रहों शनि-मंगल की छाया हो तो बालक के साथ माता की मृत्यु का दुर्योग भी बनता है। लग्न से छठे भाव में च्रंद्रमा, लग्न में शनि और सप्तम में मंगल हो तो बालक के पिता की मृत्यु होती है या उन्हें मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।
बचने के उपाय: ग्रंथों में बालारिष्ट योग से बचने के लिए बालक के गले में चांदी का चंद्रमा और मोती डालकर पहनाया जाता है। इससे बालक के सिर से मृत्यु का संकट टल जाता है, ऐसा विद्वानों का मत है।
🔱योगारिष्ट🔱
आठ वर्ष के पश्चात किंतु 20 वर्ष से पहले होने वाली मृत्यु को योगारिष्ट कहा जाता है। इस प्रकार की मृत्यु तब होती है, जब अष्टम भाव शनि, मंगल जैसे क्रूर ग्रहों से दूषित हो और लग्न में बैठा विपरीत ग्रह वक्री हो। कई विशिष्ट योगों के कारण जातक की मृत्यु होती है इसलिए इसे योगारिष्ट कहते हैं। अमावस्या से पहले की चतुर्दशी, अमावस्या और अष्टमी को यह योग पूर्ण प्रभाव में रहता है। जिन बालकों के माता-पिता कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, उनके बालकों की मृत्यु भी योगारिष्ट होती है।
बचने के उपाय: योगारिष्ट से बचने के लिए शास्त्रों के अनुसार माता-पिता को सद्कर्म करना चाहिए। यदि वे किसी का धन, स्वर्ण चुराते हैं या किसी हत्या में लिप्त रहते हैं तो उनके बालकों की मृत्यु 20 की आयु से पूर्ण होती है। शिव की उपासना इससे बचने का एकमात्र उपाय है।
🔱अल्पायु योग🔱
20 से 32 वर्ष की आयु को अल्पायु कहा गया है। विद्वानों का मत है कि वृषभ, तुला, मकर व कुंभ लग्न वाले जातक अल्पायु होते हैं, लेकिन इन लग्न वाले जातकों की कुंडली में यदि अन्य कोई शुभ ग्रह हो और सूर्य मजबूत स्थिति में हो तो इस योग का प्रभाव नहीं रहता। यदि लग्नेश चर-मेष, कर्क, तुला, मकर राशि में हो तथा अष्टमेश द्विस्वभाव- मिथुन, कन्या, धनु, मीन राशि में हो तो अल्पायु योग होता है। यदि जन्म लग्नेश सूर्य का शत्रु हो तो जातक अल्पायु होता है। इसी प्रकार यदि शनि और चंद्रमा दोनों स्थिर राशि में हों अथवा एक चर और दूसरा द्विस्वभाव में हो तो व्यक्ति की मृत्यु 20 से 32 की आयु के मध्य होती है।
बचने के उपाय: अल्पायु योग टालने के लिए ज्योतिष शास्त्र में कई उपाय बताए गए हैं। सर्वप्रथम जीवन प्रदाता शिव की आराधना, हर दिन महामृत्युंजय मंत्र की 21 माला का जाप करना चाहिए। प्रत्येक माह की दोनों अष्टमियों को शिव का दही से अभिषेक किया जाता है। अनिष्ट ग्रहों का प्रभाव टालने के लिए नवग्रह युक्त पेंडेंट गले में धारण करना चाहिए।
🔱मध्यायु योग🔱
32 वर्ष के बाद से लेकर 64 वर्ष तक की आयु सीमा को मध्यायु कहा गया है। यदि लग्नेश सूर्य का सम ग्रह बुध हो अर्थात मिथुन व कन्या लग्न वालों की प्रायः मध्यम आयु होती है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश में से एक चर- मेष, कर्क, तुला, मकर तथा दूसरा स्थिर- वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है। यदि शनि और चंद्र दोनों की द्विस्वभाव राशि में हों या एक चर तथा दूसरा स्थिर राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश सामान्य स्थानों में हो तो जातक मध्यायु होता है। कई विद्वानों का यह मत भी है कि मध्यायु योग वाले जातकों की मृत्यु जन्म स्थान से बहुत दूर होती है।
बचने के उपाय: इस योग वाले व्यक्ति को अचानक कोई आघात हो सकता है, इसलिए उनसे बचने के लिए चंद्रमा और शनि के उपाय किए जाते हैं। जातक को चांदी का स्वस्तिक गले में धारण करना चाहिए। प्रत्येक शनिवार को तीन गरीबों को काले कंबल और चप्पल दान देने की सलाह दी जाती है
🔱दीर्घायु योग🔱
64 से अधिक एवं 120 वर्ष की आयु तक होने वाली मृत्यु को दीर्घायु या पूर्णायु कहा गया है। यदि जन्म लग्नेश सूर्य का मित्र हो तो व्यक्ति को पूर्ण आयु प्राप्त होती है। लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर राशि में हो जातक दीर्घायु होता है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश में से एक स्थिर तथा दूसरा द्विस्वभाव हो तो जातक दीर्घायु होता है। यदि शुभ ग्रह तथा लग्नेश केंद्र में हो तो जातक दीर्घायु होता है। लग्नेश केंद्र में गुरु, शुक्र के साथ हो या इनकी दृष्टि हो तो जातक पूर्ण आयु का भोग करता है। लग्नेश पूर्ण बली हो तथा कोई भी तीन ग्रह उच्च, स्वग्रही या मित्र राशिस्थ होकर आठवें भाव में हो तो जातक की पूर्ण आयु होती है। इस योग वाले जातकों का जीवन आमतौर पर सुखमय देखा गया है, लेकिन बीच-बीच में कई प्रकार के रोग परेशान करते हैं। इन जातकों को जीवन पर्यन्त शिव और विष्णु की आराधना करना चाहिए।
🔱दिव्यायु योग🔱
उपरोक्त पांच प्रकार के आयु योग के बाद अब बारी आती है दिव्यायु योग की। वस्तुतः यह योग आयु से जुड़ा नहीं है, किंतु यह बताता है कि व्यक्ति का जीवन कैसा होगा। वह अपने जीवनकाल को किस प्रकार व्यतीत करेगा। यदि शुभ ग्रह बुध, बृहस्पति, शुक्र, चंद्र केंद्र और त्रिकोण में हो और सब पाप ग्रह 3, 6, 11,वें स्थान में हों तथा अष्टम भाव में शुभग्रह या शुभ राशि हो तो व्यक्ति के जीवन में दिव्य आयु का योग बनता है। ऐसा जातक यज्ञ, जप, अनुष्ठान व कायाकल्प क्रियाओं द्वारा हजारों वर्षों तक जीवित रह सकता है। किंतु ग्रंथों में यह स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे जातक का जन्म मृत्यु लोक में संभव नहीं है। ऐसी आयु तपोनिष्ठ ऋषि फिर भी पा सकते हैं।
🔱अमित आयु🔱
अमित आयु पाने वाले प्राणी भी दुर्लभ हैं। देवताओं, वसुओं, गंधर्वों को ऐसी आयु प्राप्त होती है। इसके अनुसार यदि गुरु गोपुरांश यानी अपने चतुर्वर्ग में होकर केंद्र में हो, शुक्र पारावतांश अपने षड्वर्ग में हो एवं कर्क लग्न हो तो ऐसा जातक मानव न होकर देवता होता है। इसकी आयु की कोई सीमा नहीं होती और यह इच्छा मृत्यु का कवच पाने में सक्षम होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यह योग भीष्म को प्राप्त था।
May be an image of 1 person and text that says "1 + g Dr. Nikhil Monga 12 कुंडली में आयु के कुछ दुर्लभ योग Astrologer Dr. Nikhil Monga"

Friday, 12 November 2021

श्री बजरंग बाण का पाठ


 दोहा :

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
चौपाई :
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

दोहा :
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

श्री सूक्त हिंदी अनुवाद के साथ

 श्री सूक्त या श्री सूक्तम महालक्ष्मी की उपासना के लिए ऋग्वेद में वर्णित एक स्तोत्र है।

श्री सूक्त का पाठ महालक्ष्मी की प्रसन्नता एवं उनकी कृपा प्राप्त करानेवाला है साथ ही व्यापार में वृद्धि, ऋण से मुक्ति और धन प्राप्ति के लिए भी इसका पाठ तथा अनुष्ठान किया जाता है।

श्रद्धा एवं विश्वास के साथ इस स्तोत्र का पाठ करनेवाले व्यक्ति पर माता लक्ष्मी कृपा करती हैं।

लक्ष्मी जी की कृपा होनेपर व्यक्ति सिर्फ धन और ऐश्वर्य ही नहीं बल्कि यश एवं कीर्ति भी प्राप्त करता है।



॥ श्री सूक्त ॥

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥1॥

अर्थ – हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! सुवर्ण के रंगवाली, सोने और चाँदी के हार पहनने वाली, चन्द्रमा के समान प्रसन्नकांति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिये आवाहन करो।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥2॥

अर्थ – अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवी को, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं सोना, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि को प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो।

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥3॥

अर्थ – जिन देवी के आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं तथा जो हस्तिनाद को सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवी का मैं आवाहन करता हूँ; लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां
ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां
तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥4॥

अर्थ – जो साक्षात ब्रह्मरूपा, मंद-मंद मुसकराने वाली, सोने के आवरण से आवृत, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, अपने भक्तों पर अनुग्रह करनेवाली, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं
श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये
अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥5॥

अर्थ – मैं चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों के द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता लक्ष्मीदेवी की शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो
वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु
या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥6॥

अर्थ – हे सूर्य के समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल हमारे बाहरी और भीतरी दारिद्र्य को दूर करें।

उपैतु मां देवसखः
कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्
कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥7॥

अर्थ – देवि ! देवसखा कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों अर्थात मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥8॥

अर्थ – लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन और क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि ! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्र्य और अमंगल को दूर करो।

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥9॥

अर्थ – जो दुराधर्षा और नित्यपुष्टा हैं तथा गोबर से ( पशुओं से ) युक्त गन्धगुणवती हैं। पृथ्वी ही जिनका स्वरुप है, सब भूतों की स्वामिनी उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ अपने घर में आवाहन करता हूँ।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥10॥

अर्थ – मन की कामनाओं और संकल्प की सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हो। गौ आदि पशु एवं विभिन्न प्रकार के अन्न भोग्य पदार्थों के रूप में तथा यश के रूप में श्रीदेवी हमारे यहाँ आगमन करें।

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥11॥

अर्थ – लक्ष्मी के पुत्र कर्दम की हम संतान हैं। कर्दम ऋषि ! आप हमारे यहाँ उत्पन्न हों तथा पद्मों की माला धारण करनेवाली माता लक्ष्मीदेवी को हमारे कुल में स्थापित करें।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥12॥

अर्थ – जल स्निग्ध पदार्थों की सृष्टि करे। लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! आप भी मेरे घर में वास करें और माता लक्ष्मीदेवी का मेरे कुल में निवास करायें।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥13॥

अर्थ – अग्ने ! आर्द्रस्वभावा, कमलहस्ता, पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मों की माला धारण करनेवाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे यहाँ आवाहन करें।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥14॥

अर्थ – अग्ने ! जो दुष्टों का निग्रह करनेवाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करनेवाली यष्टिरूपा, सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥15॥

अर्थ – अग्ने ! कभी नष्ट न होनेवाली उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें, जिनके आगमन से बहुत-सा धन, गौएँ, दासियाँ, अश्व और पुत्रादि को हम प्राप्त करें।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥16॥

अर्थ – जिसे लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्नि में घी की आहुतियाँ दे तथा इन पंद्रह ऋचाओं वाले श्री सूक्त का निरन्तर पाठ करे।

पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सं नि धत्स्व ॥17॥

अर्थ – कमल के समान मुखवाली ! कमलदल पर अपने चरणकमल रखनेवाली ! कमल में प्रीति रखनेवाली ! कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाली ! समग्र संसार के लिये प्रिय ! भगवान विष्णु के मन के अनुकूल आचरण करनेवाली ! आप अपने चरणकमल को मेरे हृदय में स्थापित करें।

पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षि पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥18॥

अर्थ – कमल के समान मुखमण्डल वाली ! कमल के समान ऊरुप्रदेश वाली ! कमल के समान नेत्रोंवाली ! कमल से आविर्भूत होनेवाली ! पद्माक्षि ! आप उसी प्रकार मेरा पालन करें, जिससे मुझे सुख प्राप्त हो।

अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥19॥

अर्थ – अश्वदायिनी, गोदायिनी, धनदायिनी, महाधनस्वरूपिणी हे देवि ! मेरे पास सदा धन रहे, आप मुझे सभी अभिलषित वस्तुएँ प्रदान करें।

पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥20॥

अर्थ – आप प्राणियों की माता हैं। मेरे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, हाथी, घोड़े, खच्चर तथा रथ को दीर्घ आयु से सम्पन्न करें।

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना ॥21॥

अर्थ – अग्नि, वायु, सूर्य, वसुगण, इन्द्र, बृहस्पति, वरुण तथा अश्विनी कुमार – ये सब वैभवस्वरुप हैं।

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥22॥

अर्थ – हे गरुड ! आप सोमपान करें। वृत्रासुर के विनाशक इन्द्र सोमपान करें। वे गरुड तथा इन्द्र धनवान सोमपान करने की इच्छा वाले के सोम को मुझ सोमपान की अभिलाषा वाले को प्रदान करें।

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्त्या श्रीसूक्तजापिनाम् ॥23॥

अर्थ – भक्तिपूर्वक श्री सूक्त का जप करनेवाले, पुण्यशाली लोगों को न क्रोध होता है, न ईर्ष्या होती है, न लोभ ग्रसित कर सकता है और न उनकी बुद्धि दूषित ही होती है।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्र सीद मह्यम् ॥24॥

अर्थ – कमलवासिनी, हाथ में कमल धारण करनेवाली, अत्यन्त धवल वस्त्र, गन्धानुलेप तथा पुष्पहार से सुशोभित होनेवाली, भगवान विष्णु की प्रिया लावण्यमयी तथा त्रिलोकी को ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली हे भगवति ! मुझपर प्रसन्न होइये।

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
लक्ष्मीं प्रियसखीं भूमिं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥25॥

अर्थ – भगवान विष्णु की भार्या, क्षमास्वरूपिणी, माधवी, माधवप्रिया, प्रियसखी, अच्युतवल्लभा, भूदेवी भगवती लक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ।

महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥26॥

अर्थ – हम विष्णु पत्नी महालक्ष्मी को जानते हैं तथा उनका ध्यान करते हैं। वे लक्ष्मीजी सन्मार्ग पर चलने के लिये हमें प्रेरणा प्रदान करें।

आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।
ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः ॥27॥

अर्थ – पूर्व कल्प में जो आनन्द, कर्दम, श्रीद और चिक्लीत नामक विख्यात चार ऋषि हुए थे। उसी नाम से दूसरे कल्प में भी वे ही सब लक्ष्मी के पुत्र हुए। बाद में उन्हीं पुत्रों से महालक्ष्मी अति प्रकाशमान शरीर वाली हुईं, उन्हीं महालक्ष्मी से देवता भी अनुगृहीत हुए।

ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥28॥

अर्थ – ऋण, रोग, दरिद्रता, पाप, क्षुधा, अपमृत्यु, भय, शोक तथा मानसिक ताप आदि – ये सभी मेरी बाधाएँ सदा के लिये नष्ट हो जाएँ।

श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥29॥

अर्थ – भगवती महालक्ष्मी मानव के लिये ओज, आयुष्य, आरोग्य, धन-धान्य, पशु, अनेक पुत्रों की प्राप्ति तथा सौ वर्ष के दीर्घ जीवन का विधान करें और मानव इनसे मण्डित होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करे।

॥ ऋग्वेद वर्णित श्री सूक्त सम्पूर्ण ॥

Wednesday, 1 September 2021

कुंडली के अनुसार अपने पूर्वजन्म के कर्म तथा वर्तमान का उद्देश्य जाने

 

🤷‍♀️🤷‍♂️ज्योतिष धारणा के अनुसार मनुष्य के वर्तमान जीवन में जो कुछ भी अच्छा या बुरा अनायास घट रहा है, उसे पिछले जन्म का प्रारब्ध या भोग्य अंश माना जाता है। पिछले जन्म के अच्छे कर्म इस जन्म में सुख दे रहे हैं या पिछले जन्म के पाप इस जन्म में उदय हो रहे हैं, यह खुद का जीवन देखकर जाना जा सकता है।

🌏किसी भी जातक के इस जन्म से जुड़े राज को हम कई तरह से देख सकते हैं। पहला उसकी कुंडली में गुरु ग्रह की स्थिति को देखा जाता है। जातक की पत्रिका में बृहस्पति ग्रह किस भाव में है, उसकी स्थिति के अनुसार जातक के पूर्वजन्म के कर्म तथा वर्तमान का उद्देश्य पता चलता है

🌍बृहस्पति द्वारा जहां पूर्व जन्मों के कृत्य जाने जाते हैं, वहीं शनि की स्थिति द्वारा भाग्य-कुभाग्य अथवा प्रारब्ध देखा जाता है। जिसे जातक की कुंडली के निम्न भावों में स्थिति को देखकर पता लगाया जा सकता है —

🌷लग्न भाव : यदि जातक की जन्मपत्रिका में बृहस्पति लग्न में स्थित हो तो जातक का जन्म किसी के आशीर्वाद या श्राप फलस्वरूप हुआ होता है और जातक को उसी के अनुसार सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। एकांत में जब जातक चिंतन मनन करता है, तब उसे इसका भान होता रहता है।

🌷द्वितीय व अष्टम भाव : यदि कुंडली में बृहस्पति ग्रह द्वितीय या अष्टम भाव में स्थित हो तो जातक पूर्वजन्म में संत महात्मा रहा होता है। वर्तमान में यह धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं तथा इनका जन्म अच्छे परिवार में होता है। यह इच्छापूर्ति हेतु इस जन्म में आये होते हैं।

🌷तृतीय भाव : यदि गुरु तृतीय भाव में उपस्थित हों तो जातक का जन्म किसी महिला के आशीर्वाद या श्राप के कारण हुआ होता है और यह महिला वर्तमान जन्म वाले परिवार की ही होती है। इनका जीवन आशीर्वाद के फलस्वरूप सुखमय या श्राप के फलस्वरूप कष्टों से भरा होता है।

🌷चतुर्थ भाव : कुंडली में बृहस्पति ग्रह का चतुर्थ भाव में स्थित होना उसके पूर्वजन्म में इसी परिवार का होने का संकेत देता है, जो किसी उद्देश्य की पूर्ती हेतु दोबारा उसी परिवार में जन्म लेता है और अपने उद्देश्य की पूर्ति कर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

🌷नवम भाव : गुरु ग्रह का नवम भाव में उपस्थित होना पितरों की कृपादृष्टि उनके आशीर्वाद को दर्शाता है। ऐसे व्यक्ति इस जीवन में त्याग व ब्रह्म ज्ञान की प्रवृत्ति रखता है तथा भाग्यशाली होता है।

🌷दशम भाव : जन्मपत्रिका में गुरु का दशम भाव में स्थित होना पूर्व में धार्मिक विचारों वाला होना बतलाता है। इस जन्म में वह समाज सुधारक का कार्य करता है। वह उपदेशक होता है, लेकिन पूजा-पाठ का दिखावा नहीं करता।

🌷पंचम/एकादश भाव : गुरु यदि पंचम या एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक पूर्व जन्म में तंत्र-मंत्र एवं गुप्त विद्या का जानकार होता है। जिसके कारण इस जन्म में उसे मानसिक अशांति बनी रहती है तथा दुष्ट आत्माओं द्वारा कष्ट व परेशानी पाता रहता है। जातक को संतान सुख भी कम प्राप्त होता है।

🌷दशम भाव - बृहस्पति का दशम भाव में उपस्थित होना जातक का जन्म गुरु का ऋण चुकाने के उद्देश्य से होता है। वह धार्मिकता से जीवन जीता है तथा उसके निवास के आसपास मंदिर आदि होता है।

शनि की स्थिति द्वारा भाग्य-कुभाग्य अथवा प्रारब्ध देखा जाता है। जिसे जातक की कुंडली के निम्न भावों में स्थिति को देखकर पता लगाया जा सकता है —

🌺प्रथम भाव : यदि शनि और राहु जातक की जन्मपत्रिका के प्रथम भाव में होता है तो जातक पूर्वजन्म में जड़ी-बूटियों का जानकार होता है। वर्तमान जन्म में ऐसा जातक एकांतप्रिय व शांत स्वभाव का होता है तथा इन्हें अदृश्य शक्तियों से सहायता प्राप्त होती है।

🌺द्वितीय भाव: शनि या राहु की द्वितीय भाव में स्थिति जातक के पूर्व जन्म में व्यक्तियों के सताने व कष्ट पहुंचने के विषय में बतलाती है। जिसके परिणाम स्वरुप जातक शारीरिक बाधा में रहता है और इनका बचपन आर्थिक कष्टों में गुजरता है।

🌺तृतीय भाव: यदि जातक के तृतीय भाव में शनि या राहु हों तो जातक घर की अंतिम संतान होता है। जातक को भविष्य का ज्ञान अदृश्य शक्तियों द्वारा होता रहता है।

🌺चतुर्थ भाव: इस भाव में शनि या राहु उपस्थित हो, जातक मानसिक रूप से परेशान रहता है तथा उदर रोग से पीड़ित होते हैं, इन्हें सर्प भय लगा रहता है, बहुधा यह सर्पों के विषय में जानकारी रखना पसंद करते हैं।

🌺षष्ठ भाव: वर्तमान में ये जातक भ्रमित अथवा संतान सम्बन्धी कष्टों से घिरे रहते हैं। इनकी शिक्षा में रुकावटें आती रहती हैं। इससे पूर्व जन्म का जातक द्वारा हत्या अपराध के दोष से ग्रसित होना पाया जाता है।

🌺सप्तम भाव: इस भाव में शनि या राहु पूर्वजन्म में विपरीत लिंग से संबंधित दुर्व्यवहार को दर्शाते हैं।

🌺अष्टम भाव: इस भाव में शनि-राहु होने से जातक पूर्वजन्म में तंत्र-मंत्र करने वाला रहा होता है। यही कारण है कि इस जन्म में उसे अनावश्यक भय लगा रहता है, बहुधा ये मानसिक रूप से ग्रसित पाए जाये जाते हैं।

🌺दशम भाव: इस भाव में शनि व्यक्ति का कर्मठ व मेहनती होना बताता है। पूर्वजन्म में इसने घोर यातनाएं पायी होती हैं। जिसके चलते इस जीवन में यह व्यक्ति बहुत सफल जीवन जीता है परन्तु इसकी तरक्की धीरे-धीरे ही हो पाती है।

🌺द्वादश भाव: ऐसे जातक का जन्म सर्पो के आशीर्वाद से होता है तथा यह अपने गृहस्थान से दूर कामयाब होते हैं। पूर्वजन्म में इन्हें निम्न योनी की प्राप्ति हुई होती है लेकिन इस जीवन में यह समस्त सुख प्राप्त करते हैं।

यदि किसी की पत्रिका में शनि राहु इकठ्ठे किसी भी भाव में हों तो जातक प्रेत-दोष का शिकार होता है। जिस कारण जातक का शरीर हमेशा भारीपन लिए तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां बनी रहती हैं। ये आलसी एवं क्रोधी स्वभाव के होते हैं तथा पूजा-अर्चना के समय इन्हें नींद व उबासी आती रहती है। 


बसंत पंचमी

  बसंत पंचमी यानी मां सरस् ‍ वती की पूजा का यह पर्व इस बार 5 फरवरी दिन शनिवार को देशभर में मनाया जाएगा। इस दिन दो शुभ योग बन रहे हैं। 5 फरवर...